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श्रद्धांजलि “दिल में जो ‘विरह बांसुरी’ के सुर उठेंगे जाग जायेगी रूह,

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लखनऊ वाले भुला नहीं पाएंगे योगेश ‘प्रवीण’ जी को
विनीता रानी विन्नी
लखनऊ .अवध की ऐतिहासिक झांकी, नज़ाकत ,नफासत ,खानपान को अपनी लेखनी से सजोने का सलीका जिस प्रकार डॉ योगेश प्रवीण जी ने अपनाया , उस प्रकार कोई बिरला ही कर सकेगा . वे लखनऊ की शान थे . हिंदी ,उर्दू के सशक्त हस्ताक्षर थे डॉ योगेश जी, आज हिंदी उर्दू को बाँटने वालों को इनसे सबक लेना चाहिए . डॉ प्रवीण जी ने अपनी पुस्तकों में अवध की संस्क्रति को संरक्षित करने का जो कार्य किया है वह युगों युगों तक याद किया जायेगा . यदि इनकी पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये तो ये उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी .Lवे संगीत का भी बखूबी ज्ञान रखते थे . हारमोनियम पर खेलती इनकी उंगलियां कंठ से निकलती स्वर लहरियां लोगों को अपने वशीभूत कर लेती थीं .किस्सागोई,कहानियां ,कहावतें उनकी चर्चा का अक्सर बिषय होती थी . नवाबों के दौर पर एसे बात करते थे मानो उसी दौर की महगिल सजी हो.
योगेश प्रवीन जी हमारे बीच नहीं रहे. प्राध्यापक रहे, लखनऊ इतिहास के मर्मज्ञ, इतिहासकार , नाटककार, गीतकार हिंदी उर्दू अंग्रेज़ी पर समान अधिकार रखने वाले योगेश जी दर्पण संस्था के परम हितैषी थे. दर्पण को उनका मार्गदर्शन मिलता रहा. दर्पण ने उनके लिखे नाटक हम फ़िदाए लखनऊ का मंचन किया था. दर्पण के उर्दू नाटक यहूदी की लड़की में उन्होंने भाषा स्तर पर बहुमूल्य सलाह दी थी. दर्पण की स्मारिकाओं के लिये उन्होंने लिखा. नवाब वाजिद अली शाह पर
वह इतनी सहजता से लखनऊ की ‘किस्सागोई’ शैली में बारीक से बारीक डिटेल के साथ पूरा घटना क्रम सुना डालते कि इतिहास जैसे शुष्क विषय को उन्होंने सरस कथा बना दिया . लखनऊ की कई पीढ़ियों को उन्होंने लखनऊ के प्रति आकर्षित होना, लखनऊ से मोहब्बत करना सिखाया. उनका जाना हर लखनऊ वासी को अपनी व्यक्तिगत क्षति लग रहा है। यह लखनऊ की तहज़ीब की, लखनऊ की शीरीं (मीठी) जुबान की, लखनऊ की नजाकत, नफासत और मोहब्बत की रवायत की निजी क्षति है। उन्होंने छायानट के लिए उषा परिणय, गंगा अवतरण नृत्य नाटिकायें व कई लेख लिखे। उन्होंने अपने फिल्मी सफ़र की चर्चा की थी। श्याम बेनेगल ने उनसे द्विअर्थी गीत लिखने को कहा तो योगेश जी ने स्पष्ट मना कर दिया था। वर्ष 1977 में निर्मित और 1978 में रिलीज श्याम बेनेगल की फिल्म जुनून के कुल चार गानों में से एक डॉ. योगेश प्रवीन ने लिखा था। इस फिल्म को तब सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड भी प्राप्त हुआ था। शशि कपूर, जेनिफर, दीप्ति नवल, नफीसा अली जैसे अभिनेता-अभिनेत्री इसमें सम्मिलित थे। बगीचे में दीप्ति नवल और नफीसा अली में से एक झूले पर बैठी है तथा एक झूला रही है। झूले के साथ ही योगेश जी का लिखा गीत ‘घिर आई काली घटा मतवारी, सावन की आई बहार रे’ की पार्श्व ध्वनि आती है।  लखनऊ के इतिहास को दुनियाभर में प्रसारित करने का श्रेय उनको ही जाता है।उन्हीं की ‘विरह बांसुरी’ की अंतिम पंक्ति… :
“दिल में जो ‘विरह बांसुरी’ के सुर उठेंगे
जाग जायेगी रूह, जायेंगे तक़दीर के चिराग।”

 

 

 

 

 

 

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