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कला में अनुकरण का कोई महत्व नहीः श्याम शर्मा

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  1. लिखी हुई भाषा से अलग है चित्रों की भाषाः कोलते

लखनऊ कला रंग का दूसरा दिन

BL NEWS

लखनऊ। प्रसिद्ध चित्रकार प्रभाकर कोलते ने कहा कि चित्र की भाषा लिखी हुई  से अलग होती है। लिखे हुए को हम पढ़ते और समझते हैं लेकिन चित्रों की भाषा को महसूस करते हैं। हम चित्र को देखते और उसका आनंद लेते हैं। उन्होंने कहा कि अमूर्त चित्रों को देखकर लोग कहते हैं कि इसका क्या अर्थ है? चित्रकार बनाता नहीं है, यह होता है। देखने में एक गहराई होती है और यह गहराई कहां पहुंचाएगी किसी को नहीं मालूम है।

कोलते मंगलवार को नादरंग तथा कला एवं शिल्प महाविद्यालय के तत्वावधान में महाविद्यालय परिसर में चल रहे लखनऊ कला रंग के दूसरे दिन कला यात्रा के अन्तर्गत अपने चित्रों पर बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मेरे काम पर बहुत लोगों की छाया है जिसे मैं स्वीकार करता हूं लेकिन छाया और नकल में अंतर होता है। छाया से मेरा तात्पर्य है कि मैं भी उस तरह का कुछ सोच रहा था।

कार्यक्रमों का आरंभ ‘सृजनात्मक कलाओं का महत्व, संदर्भ नई शिक्षा नीति’ पर चर्चा के साथ हुआ। वरिष्ठ चित्रकार श्याम शर्मा ने संगोष्ठी में कहा कि कला में अनुकरण का कोई महत्व नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन गतिशील है, स्थिर नहीं है। जिस दिन भारतीय चिंतन स्थिर हो जाएगा, सड़ जाएगा। उन्होंने कहा कि कलाएं बहती हुई धारा है। उसे बांधकर नहीं रखा जा सकता है, वही उसका आनंद है। शर्मा ने कहा कि स्वतंत्रता के साथ सृजनात्मकता ही आनंद देती है। उन्होंने कहा कि सृजनात्मकता का सही रूप हमें लोककला में दिखाई देता है.

आरंभ में कला एवं शिल्प महाविद्यालय के प्रधानाचार्य आलोक कुमार ने विस्तार से नई शिक्षा नीति पर चर्चा की और उसमें सृजनात्मक कलाओं के महत्व के बारे में बताया। इस मौके पर जयपुर के चित्रकार अमित कल्ला और दिल्ली की चित्रकार नूपुर कुंडू ने भी विचार व्यक्त किया।

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