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ओंकारेश्वर गऊशाला एवं लोक भारती के संयुक्त तत्वाधान में लालाघाट मंदिर, गऊघाट, चौक में तहरी सहभोज का आयोजन हुआ। इस आयोजन में साधु-संत, कई समाजसेवी संगठन के पदाधिकारी एवं क्षेत्रीय महिलाएं पुरुष और बच्चे भी शामिल हुए।

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लखनऊ, अवध प्रान्त संयोजक विजय बाहदुर सिंह बैठक को सम्बोधित करते हुए
जीवन के लिए पर्यावरण संरक्षण आवश्यक
  लोक भारती के अवध प्रान्त संयोजक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि मकर संक्रान्ति समाजिक समरसता का पर्व है। यह व्यक्ति के बीच भेद को मिटाकर आपसी प्रेम एवं सौहार्द को बढ़ावा देता है यह पर्व हमारे जीवन में नवस्फूर्ति, चेतन, उत्साह एवं उमंग का प्रतीक है। श्री सिंह ने बताया कि देश मे प्रदूषण स्तर लगातार बढ़ रहा ऐसे में जीवन रक्षा के लिए पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है प्रत्येक व्यक्ति तीज-त्योहार, पर्वो पर वृक्ष लगाना चाहिये। स्वास्थ और निरोगी शरीर पाने के लिए रासायनिक खाद से मुक्त घरों में रसोई वाटिका तैयार कर शाक-सब्जियों को उगाना चाहिये।
गऊ सेवा से मोक्ष की प्राप्ति होती है
ओंकारेश्वर गौशाला प्रबंधक सुनील कुमार मिश्र
(फ़ाइल फोटो)
ओंकारेश्वर गौशाला प्रबंधक सुनील कुमार मिश्र ने बताया कि मकर संक्रांति के पर्व पर गऊ पूजा का विशेष महत्व है। संक्रांति पर की गई गौ पूजा मनुष्यों के लिए मोक्ष के द्वार खोलती है। इंसानों को इस लोक के साथ साथ परलोक में भी सुख मिलता है।देशी नश्ल के गौ वंश से जो दूध प्राप्त होता है वह अमृत समान है जिसके सेवन शरीर निरोगी एवं पुष्ट हो जाता ऐसे देसी नश्लों के गौवंशो को संरक्षित करना प्रत्येक सनातनियों का मूल धर्म है।
जल एवं नदियों का संरक्षण प्रत्येक नागरिक दायित्व
लोक भारती के अवध प्रांत और लखनऊ विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक में सुभाष ओझा

लोक भारती के जल एवं नदी संरक्षण के अखिल भारतीय संयोजक सुभष ओझा ने बताया कि लोक भारती जल एवं नदियों के सरंक्षण के लिए संकल्पित है इसी दिशा में वो सतत प्रयास भी कर रही है। गोमती नदी समेत कई नदियों स्वछ बनाने के लिए लोक भारती समेत आम नागरिकों ने भी अपनी सहभागिता निभाई है और जल एवं नदियों का संरक्षण प्रत्येक नागरिक अपना दायित्व निभाना  होगा।

ठण्ड में तिल और गुड़ स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी होते है
बैठक में शामिल लखनऊ विभाग के संयोजक डॉ.हृदेश बिहारी
लोक भारती लखनऊ विभाग के संयोजक डॉ हृदेश बिहारी ने बताया कि जनवरी माह में संक्रांति के समय ठंड बहुत ज्यादा होती है। तिल और गुड़ गर्म होते हैं जो ठंड में स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी होते हैं, जिसके वजह से घरों में तिल और गुड के लड्डू बनते हैं। इस त्यौहार का सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है।  ये तीनों चीजें ही जीवन का आधार हैं। मकर संक्रान्ति के दिन सभी तीर्थों एवं नदियों एवं संगम के तट पर मेला लगता है जहां लोग नदियों में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।
सती माता सप्तऋषि आश्रम के महंत रवि पुरी महाराज ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुनः प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस अवधि में देह त्याग करने से व्रूक्ति जन्म मरण से मुक्त हो जाता है। इसी कारण महाभारत युद्ध में शर शैया पर पड़े भीष्म पितामह अपनी मृत्यु को उस समय तक टालते रहे, जब तक कि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण नहीं हो गया। मकर संक्रांति होने पर ही उन्होंने देह त्यागी। एक अन्य पुराण के अनुसार गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन माँ गंगा समुद्र में जाकर मिल गई।

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