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प्रेम व समृद्धि का प्रतीक, प्राकृतिक संतुलन एवं रक्षण

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                एस. वी. सिंह “प्रहरी”
कार्तिक माह की अमावस्या की अंधेरी रात में दीपक जलाकर दीपावली पर्व मनाया जाता है। दीपावली शब्द का अर्थ होता है कि पंक्तियों में दीप प्रज्वलन करना क्योंकि दीपावली शब्द दीप और आवली दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसमें दीप का अर्थ होता है दीपक तथा आवली का अर्थ पंक्ति होता है। आध्यात्मिक ग्रंथों में दीपावली मनाने के पीछे कई शुभ घटनाओं का जिक्र आता है जिनमें प्रमुख है कि इस पावन दिवस पर समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का प्रत्यक्षीकरण इस प्रकृति में हुआ था। इसलिए इस पावन दिवस पर उनका जन्म दिवस मनाया जाता है। यह भी मान्यता है कि भगवान विष्णु धरती पर मानव स्वरूप में भगवान पुरुषोत्तम राम के रूप में अवतरित हुए तथा लंका में रावण पर विजय प्राप्त कर इसी पावन दिवस पर अपनी जन्मस्थली अयोध्या में वापस आए थे, अयोध्यावासियों ने इस पावन दिवस पर दीप प्रज्ज्वलन करके खुशियों का इजहार किया। इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु के वामन अवतार एवं भगवान श्रीकृष्ण अवतार की भी कई महत्वपूर्ण घटनाएं इस पावन दिवस से जुड़ी हैं। इस पावन दिवस पर प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश तथा माता लक्ष्मी जी का विशेष पूजन विधान भी किया जाता है। ये समस्त पवित्र घटनाएं समाज की खुशियों का विषय अवश्य हैं परंतु इस पावन दिवस के कई आध्यात्मिक एवं सामाजिक कारण भी हैं।
प्राकृतिक संतुलन एवं रक्षण : दीपावली का समय वर्षा ऋतु के समापन तथा शरद ऋतु के आगमन के संधिकाल का समय होता है, जिस दौरान मौसम के बदलाव से वातावरण में दुर्गंध, फफूंद, कीट-पतंगों को विकसित होने की पर्याप्त सकारात्मक स्थितियां उपलब्ध रहती हैं, इसलिए वातावरण में असंख्य की संख्या में ये प्रदूषित एवं विनाशकारी कीट-पतंगे उत्पन्न हो जाते हैं। यदि इनकी रोकथाम न की जाए तो ये तमाम घरेलू वस्तुओं, अन्न को तो प्रदूषित करते ही हैं साथ में जानवरों एवं मनुष्यों के अंदर तमाम बीमारियां भी उत्पन्न कर देते हैं। इसी कारण से दीपावली पर्व पर सभी घरों एवं सामाजिक स्थलों को साफ- सफाई करने की प्रथा है चूंकि रोशनी के प्रति कीट-पतंगों का विशेष आकर्षण होता है, इस कारण दीपावली के दिन तेल से भरे असंख्य दीपों का प्रज्वलन किया जाता है जिससे विनाशकारी तत्व दीपों के संसर्ग में आकर अपनी जीवन लीला का अंत कर देते हैं। चूंकि इस समयावधि में इनकी संख्या तेजी से बढ़ती है, ऐसे में यदि प्रकृति इन का विनाश नहीं करें तो इनकी संख्या असंतुलित होकर मनुष्यों, प्रकृति के जीवों और तमाम वस्तुओं को भी प्रभावित कर प्रकृति में बड़ा असंतुलन पैदा कर सकती है। इसलिए दीपावली के दिवस में तेल के असंख्य दीप प्रज्ज्वलन की प्रक्रिया से प्रकृति में जीवो का संतुलन तथा समाज को इनसे होने वाले विभिन्न प्रकार के नुकसानों का रक्षण होता है।
प्रथम पूज्य श्री गणेश और माता लक्ष्मी के पूजन का आध्यात्मिक कारण : जगद् माता पार्वती पुत्र प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी हमारी बुद्धि रूपी ऊर्जा के रूप में शरीर के कैलाश रूपी मस्तिष्क में विद्यमान रहते हैं तथा माता लक्ष्मी, जो जगत में धन एवं समृद्धि की प्रतीक हैं, का वास हमारे शरीर में प्रेम एवं समृद्धि और ऊर्जा के रूप में सदैव भगवान विष्णु जी के साथ हृदय में होता है। चूंकि अस्थाई रूप से धन एवं समृद्धि प्राप्त करने तथा उसको संचय रखने के लिए सकारात्मक बुद्धि की नितांत आवश्यकता होती है, उदाहरणार्थ- जैसे यदि किसी मनुष्य को मां लक्ष्मी जी की कृपादृष्टि से खूब धन संपदा प्राप्त भी हो जाए परंतु यदि उस मनुष्य के पास प्राप्त धन संपदा के उपयोग तथा उसको संभालने हेतु सकारात्मक बुद्धि नहीं है तो वह लंबे समय तक उस प्राप्त धन संपदा का मालिक नहीं रह सकता तथा कभी-कभी वह प्राप्त की गयी संपदा किसी के विनाश का कारण भी बन सकती है। इसलिए इस पावन दिवस पर माता लक्ष्मी जी के साथ बुद्धिदाता प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी के पूजन का विधान भी है।
दीपक जलाने का महत्व : भगवान श्रीकृष्ण ने धरती पर अवतरित होकर संसार को प्रेम का पाठ पढ़ाया और संदेश दिया कि प्रेम से जीवन की अधिकाधिक समस्याओं का समाधान संभव है। चूंकि दीपक का अर्थ एवं उद्देश्य होता है प्रकाश, प्रेम और ज्ञान तथा दीपक ही यज्ञ एवं अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व मनुष्य एवं उसके आराध्य के मध्य संवाद के रूप में करता है, इसी कारण अपने आराध्य की कृपादृष्टि पाने के लिए मनुष्य दीपक जलाकर उनकी आरती एवं यज्ञ आदि उपक्रम करता रहता है।
संसार में अंधेरे को अज्ञानता तथा प्रकाश को ज्ञान का प्रतीक कहा गया है। चूंकि किसी भी कर्म में भाव बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि प्रारब्ध एवं कर्मफल इसी भाव से निर्मित होता है, इस पावन दिवस पर पवित्र तथा खुशियों भरे भाव से जब हम तमाम दीपक जलाते हैं तो हमारे अंदर ज्ञानरूपी सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है तथा अज्ञानता रूपी नकारात्मक ऊर्जा का विनाश होता है। क्योंकि ज्ञान ऐसा माध्यम है जो हमें अपने जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति में हर क्षण रास्ता दिखाता है तथा प्रेम एवं समाज के जीवों के अंदर एक-दूसरे के लिए करुणा एवं सहायता का भाव उत्पन्न करता है।
“ज्ञान” जो मनुष्य के शरीर में भगवान शिव की “चेतन” ऊर्जा तत्व अंश के रूप में मस्तिष्क में वास करके सृजित विचारों एवं इच्छाशक्ति उत्पन्न करता है तथा प्रेम जो मनुष्य के हृदय में भगवान विष्णु जी के आत्मा ऊर्जा अंश के रूप में वास करके सृजित विचारों एवं इच्छाशक्ति के अनुरूप जीवन संचालन का दायित्व निर्वहन करता है। इस पावन दिवस पर असंख्य दीप प्रज्ज्वलन करके हम अपने अंदर ज्ञान एवं प्रेम की ज्वाला प्रज्ज्वलित करते हैं, जिससे समाज में प्रेम एवं सौहार्द का वातावरण बनता है।
दुष्प्रथाओं का अंत आवश्यक :
मनुष्य को ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे संपूर्ण समाज में खुशियां व्याप्त हों क्योंकि हम, हमारा परिवार तथा आने वाली हमारी पीढ़ियां भी इस समाज का हिस्सा होती हैं। दीपावली में कुछ चंद लोगों ने समाज की चिंता किए बिना अपने स्वयं को स्वयं की खुशियों को प्राप्त करने के लिए दीपावली के दिवस पर ज्वलनशील पटाखों को जलाने तथा मदिरापान करने एवं जुआ आदि खेलने की प्रथा प्रारंभ की है।
यहां यह समझना आवश्यक है कि ऐसा हर कर्म तथा ऐसी हर प्रथा जिससे प्रकृति एवं समाज को क्षति पहुंचती है, उस कर्म अथवा प्रथा से हमारे आराध्य अथवा ईश्वर बिल्कुल पसंद नहीं होते। पटाखों के जलाने से प्राकृतिक वातावरण, जिससे हम स्वयं भी आक्सीजन रूपी प्राणवायु प्राप्त कर जीवन जी रहे हैं, में प्रदूषण तथा अर्थात कार्बन डाइ-ऑक्साइड तथा अन्य हानिकारक गैसों/तत्वों का स्तर इतना बढ़ जाता है कि जिससे प्रकृति के जीव-जंतु तथा पेड़-पौधों का तो विनाश होता ही है, प्रदूषण से सामाजिक मनुष्यों में भयंकर बीमारियों का भी जन्म होता है। इसके अतिरिक्त मांस, मदिरा व जुआ को विनाश का बड़ा कारक कहा जाता है।
जन कल्याण हेतु प्रार्थना : जन कल्याण हेतु हम सभी को एक-दूसरे से प्रार्थना करनी चाहिए दीपावली के आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्व को समझ कर इन पटाखों को जलाने तथा मदिरा-पान एवं जुआ आदि की कुरीतियों को त्याग कर अपने अंदर के प्रेम एवं ज्ञान के दीपक को प्रज्ज्वलित करें जिससे समाज में प्रेम एवं सौहार्द एवं समृद्धि का वातावरण बने।

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